Tuesday, December 19, 2006

sanskrit ka maja hindi main

मण्डला के प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ने किया महाकवि कालीदास के ग्रँथों का हिन्दी पद्यानुवाद

मण्डला . नि.प्र. , भारतीय संस्कृति में आत्म प्रशंसा को शालीनता के विपरीत आचरण माना गया है , यही कारण है कि जहाँ विदेशी लेखकों के आत्म परिचय सहज सुलभ हैं ,वहीं कवि कुल शिरोमणी महाकवि कालिदास जैसे भारतीय मनीषीयों के ग्रँथ तो सुलभ हैं किन्तु इनकी जीवनी दुर्लभ हैं ! महाकवि कालिदास की विश्व प्रसिद्ध कृतियों मेघदूतम् , रघुवंशम् , कुमारसंभवम् , अभिग्यानशाकुन्तलम् आदि ग्रंथों में संस्कृत न जानने वाले पाठको की भी गहन रुचि है ! ऐसे पाठक अनुवाद पढ़कर ही इन महान ग्रंथों को समझने का प्रयत्न करते हैं ! किन्तु अनुवाद की सीमायें होती हैं ! अनुवाद में काव्य का शिल्प सौन्दर्य नष्ट हो जाता है ! ई बुक्स के इस समय में भी प्रकाशित पुस्तकों को पढ़ने का आनंद अलग ही है ! मण्डला के प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी ने महाकवि कालीदास कृत मेघदूतम् के समस्त १२१ मूल संस्कृत श्लोकों का एवं रघुवंश के सभी १९ सर्गों के लगभग १७०० मूल संस्कृत श्लोकों का श्लोकशः हिन्दी गेय छंद बद्ध भाव पद्यानुवाद कर हिन्दी के पाठको के लिये अद्वितीय कार्य किया है ! उदाहरण स्वरूप मेघदूतम् हिन्दी पद्यानुवाद से एक श्लोक


मूल संस्कृत श्लोक
कस्यात्यन्तं सुखमुपगतं दुःखमेकान्ततोवा
नीचैर्गच्छिति उपरिचदशा चक्रमिक्रमेण ॥
हिन्दी अनुवाद

किसको मिला सुख सदा या भला दुःख
दिवस रात इनके चरण चूमते हैं
सदा चक्र की परिधि की भाँति क्रमशः
जगत में ये दोनों रहे घूमते हैं



प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव अपनी विभिन्न कृतियों मुक्तक मंजूषा हिन्दी छंदबद्ध १०८ देश प्रेम के गेय गीत वतन को नमन नैतिक कथायें ईशाराधन अनुगुंजन आदि पुस्तकों हेतु सुपरिचित हैं !

धर्म तो प्रेम का दूसरा नाम है , प्रेम को कोई बंधन नहीं चाहिये
सच्ची पूजा तो होती है मन से जिसे आरती धूप चंदन नहीं चाहिये

................प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव की.मुक्तक मंजूषा से



हिमगिरि शोभित सागर सेवित
सुखदा गुणमय गरिमा वाली
सस्य श्यामला शांति दायिनी
परम विशाला वैभवशाली ॥

प्राकृत पावन पुण्य पुरातन
सतत नीती नय नेह प्रकाशिनि
सत्य बन्धुता समता करुणा
स्वतंत्रता शुचिता अभिलाषिणि ॥

ग्यानमयी युग बोध दायिनी
बहु भाषा भाषिणि सन्मानी
हम सबकी माँ भारत माता
सुसंस्कार दायिनि कल्यानी ॥



................प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव की वतन को नमन से अंश





हो रहा आचरण का निरंतर पतन , राम जाने कि क्यों राम आते नहीं
है सिसकती अयोध्या दुखी नागरिक देके उनको देके शरण क्यों बचाते नहीं ?

..................प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव की अनुगुंजन से




शुभवस्त्रे हंस वाहिनी वीण वादिनी शारदे ,
डूबते संसार को अवलंब दे आधार दे !
हो रही घर घर निरंतर आज धन की साधना ,
स्वार्थ के चंदन अगरु से अर्चना आराधना !
आत्म वंचित मन सशंकित विश्व बहुत उदास है ,
चेतना जग की जगा मां वीण की झंकार दे !

.............................प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव की ईशाराधन से



महाकवि कालीदास कृत रघुवंशम् का श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
समस्त १९ सर्ग लगभग ४०० पृष्ठ लगभग १७०० श्लोक हेतु उन्हें प्रकाशक चाहिये ! रघुवंशम् से अंश इस तरह है

शासन हर वर्ष कालिदास समारोह के नाम पर करोंडों रूपये व्यय कर रहा है ! जन हित में इन अप्रतिम कृतियों को आम आदमी के लिये संस्कृत में रुचि पैदा करने हेतु सी डी में तैयार इन पुस्तकों को इलेक्र्टानिक माध्यमों से दिखाया जाना चाहिये ! जिससे यह विश्व स्तरीय कार्य समुचित सराहना पा सकेगा !


उनका पता है
प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
विवेक सदन , नर्मदा गंज , मण्डला म.प्र. भारत पिन ४८१६६१

फोन ०७६४२ २५००६८ , मोबाइल ९१ ९४२५१६३९५२

our books

ई बुक्स के इस समय में भी प्रकाशित पुस्तकों को पढ़ने का आनंद अलग ही है
सहज सुलभ हमारी हिन्दी पुस्तकें


किताबों की प्रतियां प्राप्त करने के लिये मूल्य इस पते पर भिजवायें ..........

प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
विवेक सदन , नर्मदा गंज , मण्डला म.प्र. भारत पिन ४८१६६१
फोन ०७६४२ २५००६८ , मोबाइल ९१ ९४२५१६३९५२



१. महाकवि कालीदास कृत मेघदूतम् का श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
मूल्य भारतीय रूपये ३५.०० , यू.एस.डालर ४

मूल संस्कृत श्लोक
कस्यात्यन्तं सुखमुपगतं दुःखमेकान्ततोवा
नीचैर्गच्छिति उपरिचदशा चक्रमिक्रमेण ॥
हिन्दी अनुवाद

किसको मिला सुख सदा या भला दुःख
दिवस रात इनके चरण चूमते हैं
सदा चक्र की परिधि की भाँति क्रमशः
जगत में ये दोनों रहे घूमते हैं

...................मेघदूतम् हिन्दी पद्यानुवाद से अंश


२ मुक्तक मंजूषा द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव

मूल्य भारतीय रूपये ३५.०० , यू.एस.डालर ४

धर्म तो प्रेम का दूसरा नाम है , प्रेम को कोई बंधन नहीं चाहिये
सच्ची पूजा तो होती है मन से जिसे आरती धूप चंदन नहीं चाहिये

.................मुक्तक मंजूषा से





३. वतन को नमन हिन्दी छंदबद्ध १०८ देश प्रेम के गेय गीत द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
मूल्य भारतीय रूपये १५०.०० ,यू.एस.डालर १५.००

हिमगिरि शोभित सागर सेवित
सुखदा गुणमय गरिमा वाली
सस्य श्यामला शांति दायिनी
परम विशाला वैभवशाली ॥

प्राकृत पावन पुण्य पुरातन
सतत नीती नय नेह प्रकाशिनि
सत्य बन्धुता समता करुणा
स्वतंत्रता शुचिता अभिलाषिणि ॥

ग्यानमयी युग बोध दायिनी
बहु भाषा भाषिणि सन्मानी
हम सबकी माँ भारत माता
सुसंस्कार दायिनि कल्यानी ॥



................ वतन को नमन से अंश



४. अनुगुंजन हिन्दी छंदबद्ध पद्य विविध गेय गीत द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
मूल्य भारतीय रूपये १५०.०० ,यू.एस.डालर १५.००

हो रहा आचरण का निरंतर पतन , राम जाने कि क्यों राम आते नहीं
है सिसकती अयोध्या दुखी नागरिक देके उनको देके शरण क्यों बचाते नहीं ?

..................अनुगुंजन से



५. ईशाराधन हिन्दी छंदबद्ध पद्य ५१ ईश्वरीय प्रार्थनायें द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
मूल्य भारतीय रूपये २५.०० ,यू.एस.डालर ३.००

शुभवस्त्रे हंस वाहिनी वीण वादिनी शारदे ,
डूबते संसार को अवलंब दे आधार दे !
हो रही घर घर निरंतर आज धन की साधना ,
स्वार्थ के चंदन अगरु से अर्चना आराधना !
आत्म वंचित मन सशंकित विश्व बहुत उदास है ,
चेतना जग की जगा मां वीण की झंकार दे !

............................. ईशाराधन से

६ . नैतिक कथायें द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
मूल्य भारतीय रूपये १५०.०० ,यू.एस.डालर १५.००

बाल कथाओं का संग्रह



७. आक्रोश हिन्दी नई कविताओं का संग्रह द्वारा इं. विवेक रंजन श्रीवास्तव
मूल्य भारतीय रूपये ३५.०० ,यू.एस.डालर ४.००


जानता हूँ मैं कि तुम्हें ,
अच्छा नहीं लगता
मेरा लिखना खरा खरा
माना कि क्रांति नहीं होगी
मेरे लिखने भर से
पर मेरे न लिखने से
यथार्थ
सुनहले सपनों सा सुंदर
तो नहीं हो जायेगा ?
सपनों को बनाने के लिये यथार्थ
विवशता है
अभिव्यक्ति आक्रोश की !




......................आक्रोश से अंश



८. राम भरोसे हिन्दी व्यंग संग्रह द्वारा इं. विवेक रंजन श्रीवास्तव
मूल्य भारतीय रूपये ८०.०० ,यू.एस.डालर ८.००

रामभरोसे मेरे संप्रभुता सम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य की प्राथमिक इकाई है , उसने हाल ही १८ की उमर पार की है, संविधान उसे मताधिकार दे गया है । इसी के साथ मुंआ महत्वपूर्ण वोटर बन गया है ।.................
.....................इन्हीं अनुभवों से मेरी ढ़ृड आस्था बन गई है कि हमारा लोकतंत्र रामभरोसे की सूझबूझ पर ही जिंदा है, राम करे कि रामभरोसे की सूझबूझ ऐसी ही बनी रहे और हर बार नये सिरे से उल्लू बनने के लिये रामभरोसे के द्वारा ,रामभरोसे के मालिकों के लिये ,रामभरोसे के नेताओं का शासन यूं ही चलता रहे।.................


........................रामभरोसे व्यंग संग्रह से अंश



९. जादू शिछा का हिन्दी नुक्कड नाटक द्वारा इं. विवेक रंजन श्रीवास्तव
मूल्य भारतीय रूपये १०.०० ,यू.एस.डालर १.००

जादूगर ॰ इन किताबों में रोजगार छिपा है ।
जम्हूरा ॰ ऐसा क्या उस्ताद ?
जादूगर ॰ जिसने किताबों को पढ़ , समझ लिया वह आम से खास बन गया ।


जादू शिछा का से अंश....................







प्रकाशक चाहिये महाकवि कालीदास कृत रघुवंशम् का श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
समस्त २१ सर्ग लगभग ४०० पृष्ठ





किताबों की प्रतियां प्राप्त करने के लिये मूल्य इस पते पर भिजवायें .......... ,

प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
विवेक सदन , नर्मदा गंज , मण्डला म.प्र. भारत पिन ४८१६६१

फोन ०७६४२ २५००६८ , मोबाइल ९१ ९४२५१६३९५२

Monday, October 09, 2006

ॐ श्री चित्रगुप्त देवेश...............

ॐ श्री चित्रगुप्त देवेश...............


रचियता ॰ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
विवेक सदन
नर्मदा गंज मण्डला म.प्र. भारत



ॐ श्री चित्रगुप्त देवेश जय हो श्री चित्रगुप्त स्वामी.................
सुखदाता तुम , दुखत्राता तुम , प्रभु अन्तरयामी

ब्रम्ह देव के मानस सुत तुम , काया से उभरे
जग का लेखा जोखा रखते कलम दवात धरे
समदर्शी निष्पक्छ विचारक शांत न्यायकारी
विमल दृष्टि ,ग्यानी , गुन सागर जग के हितकारि

ॐ श्री चित्रगुप्त देवेश जय हो श्री चित्रगुप्त स्वामी...............


चिर अविनाशी , घट घट वासी जन जन के स्वामी
हर मन की इच्छा के ग्याता , वरदाता नामी
रखते प्रभु तुम छण छण हर जन जीवन का लेखा
छुपी न तुमसे कभी किसी की ,गुप्त चित्त रेखा

ॐ श्री चित्रगुप्त देवेश जय हो श्री चित्रगुप्त स्वामी...............


वीतराग तुम तुम्हें परम प्रिय ,सत्य न्याय शिक्छा
सदा शांति प्रिय सात्विक भक्तों की करते रक्छा
भक्ति भाव से मिल हम करते पूजन आराधन
करो देव स्वीकार , सफल हो तन मन धन साधन

ॐ श्री चित्रगुप्त देवेश जय हो श्री चित्रगुप्त स्वामी...............


कृपा करो प्रभु हर कुल में नित सुख समृद्धि पले
हो सदभाव हरेक के मन में , प्रेमल ज्योति जले
दूर अँधेरा हो हर घर से , आश किरन छाये
दुःखो से तपता जीवन पा आशीष मुस्काये

ॐ श्री चित्रगुप्त देवेश जय हो श्री चित्रगुप्त स्वामी................



रचियता ॰ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
विवेक सदन
नर्मदा गंज मण्डला म.प्र. भारत

bhagwan chitragupta ki aarati